June 17, 2024
उत्तराखंड के पुरोला में हिन्दू संगठनों की ओर से बुलाई गई महापंचायत  प्रशासन के कड़े रुख के कारण नहीं हो सकी। इससे पहले हिंदूवादी संगठनों ने ऐलान किया था कि वह 15 जून को हर हाल में पुरोला में महापंचायत करेंगे और समुदाय विशेष के लोगों को पुरोला सहित उत्तरकाशी जिले के सभी कस्बों और गांवों को छोड़ने की मांग करेंगे। 26 मई को हुई घटना के बाद पुलिस ने दो युवकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया था।

इसके बावजूद 28 मई को पुरोला में और उसके बाद आस-पास के कस्बों में हिन्दूवादी संगठनों ने प्रदर्शन कर बाजार बंद किये और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को वहां से चले जाने की चेतावनी दी। इसके साथ ही इन संगठनों ने 15 जून को पुरोला में महापंचायत बुलाई थी। इस महापंचायत को लेकर चौतरफा दबाव के बाद प्रशासन ने महापंचायत की अनुमति देने से इंकार कर दिया था। हिन्दूवादी संगठन इसके बाद भी महापंचायत करने पर आमादा थे। इसे देखते हुए प्रशासन ने 14 जून से 19 जून तक के लिए पुरोला में धारा 144 लागू कर दी थी।

इस बीच हाईकोर्ट ने भी 15 जून को इस मामले में सुनवाई की। एसोसिएशन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स के सदस्य एडवोकेट शाहरुख आलम ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष पुरोला में सांप्रदायिक तनाव के बीच हिंदू संगठनों द्वारा बुलाई गई महापंचायत पर रोक लगाने के लिए एक जनहित याचिका दायर की थी। पहले वे इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट की अवकाश कार्य खंडपीठ के सामने गए थे।

purola
महापंचायत में जाने से पुलिस ने एक नेता को रोका तो उसने समर्थकों के साथ अपने घर से ही नारेबाजी की।

खंडपीठ ने याचिका पर सुनवाई करने से यह कहकर इंकार कर दिया था कि याचिकाकर्ता अपने प्रदेश के हाई कोर्ट में याचिका दायर करे। याचिकाकर्ता ने इस आशंका से इस महापंचायत पर रोक लगाने की मांग की थी कि महापंचायत में धार्मिक संगठनों के नेता हेट स्पीच दे सकते हैं हालांकि हाई कोर्ट द्वारा याचिका पर सुनवाई से पहले ही 14 जून को प्रशासन ने पुरोला में धारा 144 लागू कर दी थी और किसी बाहरी व्यक्ति को पुरोला में घुसने पर रोक लगा दी थी।

हाई कोर्ट ने इस मामले में सख्त रुख अपनाया और सरकार से इस मामले में कानून के अनुसार कार्रवाई करने के आदेश दिये।  हाईकोर्ट में राज्य सरकार से इस मामले में 3 हफ्ते में जवाब देने के लिए कहा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी भी हालत में राज्य के किसी भी हिस्से में कानून-व्यवस्था बिगड़नी नहीं चाहिए। अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की दुकानों में की गई तोड़फोड़ के संदर्भ में होईकोर्ट ने कहा कि किसी भी व्यक्ति की जान या माल का नुकसान न हो। पुलिस ने कोर्ट को बताया कि महापंचायत की इजाजत नहीं दी गई है और धारा 144 लागू कर दी गई है।

14 जून को पुरोला में धारा 144 लागू कर दिये जाने और पुलिस व प्रशासन के कड़े रुख के बावजूद हिन्दूवादी संगठन पुरोला जाने पर आमादा थे। इसे देखते हुए पुरोला और आसपास के क्षेत्रों में पुलिस ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किये थे। महापंचायत से जुड़े धार्मिक नेताओं पर भी पुलिस लगातार नजर रखे हुए थी। इस आयोजन के एक प्रमुख नेता को उसके घर में ही नजरबंद कर दिया गया था।

महापंचायत के आयोजकों ने 14 जून की देर शाम एक वीडियो जारी करके प्रशासन का सहयोग न मिलने के कारण महापंचायत को स्थगित करने का ऐलान किया था और कहा था कि महापंचायत का आयोजन भविष्य में किया जाएगा। इसके बावजूद पुरोला पहुंचने के छिटपुट प्रयास किये गये। बताया जाता है कि देहरादून से बजरंग दल के 4 कार्यकर्ता पुलिस को चकमा देकर पुरोला के नगर पंचायत मैदान में पहुंच गये और धरने पर बैठ गये। लेकिन, उनके समर्थन में कोई वहां नहीं पहुंचा। कुछ देर वहां बैठने के बाद चारों सदस्य भी लौट आये।

प्रशासन ने 14 जून की रात को व्यापारियों और महापंचायत के आयोजकों को मना लिया था और देर रात उन्होंने महापंचायत स्थगित करने की घोषणा भी कर दी थी। लेकिन इसके बावजूद व्यापारियों का विरोध जारी रहा और 15 जून को पुरोला सहित आसपास के सभी कस्बों में व्यापारियों ने अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ अपनी दुकानें बंद रखीं। पुरोला के साथ ही नौगांव, डामटा, उत्तरकाशी और टिहरी जिले के नैनबाग और चम्बा तक में विरोध स्वरूप बाजार बंद रखे जाने की सूचना है। व्यापारियों के इस बंद से साफ है कि यह मामला असल में लव जेहाद की आड़ में व्यापारिक प्रतिस्पर्धा का ही है। बाजार की प्रतिस्पर्धा के चलते स्थानीय व्यापारी नहीं चाहते कि अल्प संख्यक समुदाय के व्यापारी वहां व्यवसाय करें। उन्हें इन कस्बों से हटाकर वे प्रतिस्पर्धा को कम करने की फिराक में हैं।

महापंचायत को देखते हुए पुरोला में 28 मई के बाद रुक गये मुस्लिम समुदाय के लोग भी अपने घरों से चले गये थे। हालांकि इन लोगों ने शादी या अन्य कारणों से पुरोला से बाहर होने और कुछ दिन बाद वापस आने की बात की। लेकिन, वास्तविकता यह है कि महापंचायत के दौरान उग्र भीड़ उन्हें या उनके परिवार को किसी तरह का नुकसान न पहुंचाए, इसे देखते हुए मुस्लिम समुदाय के लोगों ने पुरोला छोड़ दिया था। दरअसल हाल के दिनों में जिस तरह से अधिकारियों ने, खासकर पुरोला के एसडीएम और चौकी इंचार्ज ने इस समुदाय के लोगों के साथ बर्ताव किया, उसे देखते हुए इन लोगों को भरोसा नहीं रह गया था कि यदि भीड़ ने उन पर हमला किया तो प्रशासन की ओर से उन्हें कोई मदद मिल पायेगी। ऐसी स्थिति के चलते इन लोगों ने कुछ दिनों के लिए पुरोला छोड़ दिया है।

इस बीच उत्तराखंड में जन मुद्दों के लिए संघर्ष करने वाले संगठनों के साथ ही वामपंथी दलों ने अल्प संख्यक समुदाय पर की जा रही ज्यादतियों के विरोध में डिजिटल विरोध अभियान चलाया। जन हस्तक्षेप के तहत चलाये गये इस अभियान के तहत इन पार्टियों और संगठनों के दर्जनों सदस्यों ने अपने-अपने घरों पर नारे लिखी तख्तियों के साथ धरना दिया। इन तख्तियों पर नफरत नहीं रोजगार दो; संविधान बचाओ, लोकतंत्र बचाओ; हिंसा, नफरत नहीं, कानून का राज स्थापित करो; जैसे नारे लिखे गये थे। इस तरह के प्रदर्शनों की सभी फोटो हैशटेग जन हस्तक्षेप के नाम से सोशल मीडिया पर साझा की गई।

इस बीच स्वामी केशव गिरी के नेतृत्व में पुरोला की ओर बढ़ रही सैकड़ों लोगों की भीड़ को पुलिस ने नौगांव में रोक दिया। यहां पुलिस के साथ जमकर धक्का-मुक्की हुई। हालांकि पुलिस ने किसी तरह का बल प्रयोग नहीं किया। बाद में केशव गिरी महाराज को गिरफ्तार किया गया। उनके साथ ही भीड़ में मौजूद कई अन्य लोगों ने भी गिरफ्तारी दी, जिन्हें कुछ दूर जाकर छोड़ दिया गया। महापंचायत स्थगित किए जाने के बावजूद पुरोला की ओर बढ़ रहे कुछ अन्य लोगों को भी अलग-अलग जगहों से गिरफ्तार किए जाने की सूचना है।

(उत्तराखंड से वरिष्ठ पत्रकार त्रिलोचन भट्ट की रिपोर्ट।)

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