July 12, 2024

भंवर मेघवंशी

इसमें कोई संदेह नहीं है कि भाजपा को 2024 में राजनीतिक फ़ायदा हो, इसके लिए अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन 22 जनवरी को किया जा रहा है। भले ही इसे धार्मिक आयोजन बताया जा रहा है, लेकिन यह पूर्णतः राजनीतिक नफ़ा नुक़सान का मामला है। राम के नाम पर हिंदुत्ववादी राजनीति ने विगत तीन दशकों से वोट की फसलें काटी है। यह बात किसी से ढंकी-छिपी नहीं है।

मौजूदा हाल यह है कि राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र से आए अक्षत (चावल) का आजकल घर-घर वितरण का काम चल रहा है। इन चावलों को गांव, मोहल्लों और क़स्बों के मंदिरों में स्थापित किया जा रहा है। लोग सिरों पर लेकर इनकी शोभायात्रा निकाल रहे हैं। इलाक़े के साधु-महात्माओं को साथ लेकर रथ यात्राएं तक निकाली जा रही हैं। देखा जाय तो इस तरह के आयोजनों से माहौल बनाया जा रहा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए यह नई बात नहीं है। पूर्व में भी यहीं होता रहा है। सन् 1987 में जब राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद को संघ ने अपने हाथ में लिया, तब से इसी तरह के सांस्कृतिक धार्मिक प्रयोगों के ज़रिए लोगों को भ्रमित किया जाता रहा है।

सबसे पहले राम शिला पूजन हुआ। गांव-गांव से ईंटें अयोध्या ले जाई गईं। लेकिन उनका क्या हुआ? वे राम शिलाएं वर्तमान में तैयार हुए मंदिर के किस हिस्से में इस्तेमाल किया गया, इसकी कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती। जन-स्मृतियां बहुत क्षणिक होती हैं। हम याद कर सकते हैं कि बाबरी ढांचे का ताला खोला गया। बाद में शिलान्यास भी हुआ। पुराने शिलान्यास के बाद भी शिलान्यास दुहराया गया, क्योंकि वर्तमान सत्ताधीशों को फिर से शिलान्यास करना था। दो बार कारसेवा हुई। सन् 1990 में मुलायम सिंह यादव सरकार ने बाबरी मस्जिद ढांचे को कोई नुक़सान नहीं होने दिया। सन् 1991 में ‘मंदिर सौंपो या गद्दी छोड़ो’ आंदोलन चला। इसके तहत सन् 1992 की 6 दिसंबर को हुई दूसरी कारसेवा में बाबरी मस्जिद ढाह दी गई। इसके बाद भी हर वर्ष कुछ न कुछ अभियान चलते ही रहे। सन् 2002 में हुए कार्यक्रम से वापस लौट रहे राम सेवकों की ट्रेन गोधरा में जला दी गई। उसके बाद गुजरात में व्यापक नरसंहार को अंजाम दिया गया। राम रथ यात्रा के बाद हुए देशव्यापी दंगे तो भुलाए नहीं जा सकेंगे। अंतत: सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आ गया और मंदिर बनने का रास्ता खुल गया। लाखों करोड़ रुपए धन संग्रह हुआ और अब भव्य मंदिर बनकर तैयार है।

राम जन्मभूमि मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश को संबोधित करेंगे। अयोध्या रेलवे स्टेशन का नाम अयोध्या धाम कर दिया गया है और एयरपोर्ट महर्षि वाल्मीकि के नाम से होगा। इस बीच छोटी-मोटी ऐसी खबरें भी चलवाई गईं कि रामजन्मभूमि आंदोलन के पुरोधा रहे बुजुर्ग लाल कृष्ण आडवाणी व मुरलीमनोहर जोशी को अयोध्या नहीं आने के लिए कहा गया है। हालांकि सोशल मीडिया में आलोचना के बाद रामजन्मभूमि ट्रस्ट के ज़िम्मेदार लोग आडवाणी को निमंत्रण देते नज़र भी आए।

निर्माणाधीन राम जन्मभूमि मंदिर

जिनकी सत्ता होती है, उनका ही धर्म फलता-फूलता है। इसी को राजधर्म कहा जाता है। अब भारत का अघोषित राज धर्म सनातन बनता जा रहा है और उसकी सांस्कृतिक आध्यात्मिक राजधानी के रूप में अयोध्या को स्थापित किया जा रहा है। चुनाव में जीत कर आए लोग खुद को चक्रवर्ती सम्राट समझ कर अपनी भूमिकाएं निभा रहे हैं। यह हिंदू राष्ट्र की आहट नहीं, बल्कि उसकी स्थापना का उद्घोष है। यह सत्ता और उसके द्वारा पोषित धर्म का संयुक्त शंखनाद है, जिसके तुमुलनाद तले धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की आवाज़ दबती जा रही है। आम जनता इसे अपनी और राष्ट्र की नियति समझकर लगातार चुप हो जा रही है। हर अन्याय और विसंगति पर बोलने वाले लोग ख़ामोश हो रहे हैं। प्रतिक्रियावादियों का शोर बढ़ता जा रहा है।

राममंदिर के आंदोलन का समय और बहुजन राजनीति का उभार तथा मंडल आयोग की सिफ़ारिशों के लागू होने का समय लगभग समान है। मंडलवादी ताक़तों और कमंडलवादी ताक़तों के मध्य निर्णायक संघर्ष भी चला। कभी लगा कि यह जीता तो कभी लगा कि वो हारे, लेकिन निरंतर चली इस लड़ाई में अंतत: सांप्रदायिक ताक़तों ने विजय पाई। आज फिर सामाजिक न्याय की बात तेज हो रही है और जातिगत जनगणना का सवाल प्रमुखता से उठाया जा रहा है तो फिर से देश भर में मंदिर निर्माण और अक्षत-पूजन तथा प्राण-प्रतिष्ठा का शोर हावी हो चुका है।

ऐसा क्यों हो रहा है कि जब भी नागरिकों को अधिकार संपन्न बनाने की कोई लोकतांत्रिक मुहिम ज़ोर पकड़ने लगती है तो धार्मिक अभियान चल पड़ते हैं। जब लोग संविधान बचाने के लिए उठने लगते हैं तो लाखों बाबा लोग कथा प्रवचन और भजन कीर्तन करने मैदान में उतर जाते हैं। जब डॉ. आंबेडकर और जवाहर लाल नेहरू हिंदू कोड बिल पास कराने का प्रयास कर रहे थे तो ये ताक़तें ही स्वामी करपात्री की अगुवाई में रामलीला मैदान में उनके पुतले जलाने लगी और धमकियां देने लगी। जब बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ, राजा महाराजाओं के प्रिवी पर्स बंद किए गए, ज़मीन की हदबंदी का क़ानून लागू हुआ, तब भी प्रतिक्रियावादी ताक़तों ने बवाल काटा ही था। हर उस समय जब भी प्राचीन भारत की प्रजा को वर्तमान लोकतांत्रिक भारत का नागरिक बनकर अधिकार संपन्न बनाने का कोई भी प्रयास हुआ, योजनाबद्ध तरीक़े से धर्म, संस्कृति और समाज की आड़ ले कर तरह-तरह के उन्मादी आंदोलन खड़े किए गए, जो आज भी जारी है।

अब एक तरफ़ मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की बातें हो रही हैं तो दूसरी तरफ़ जाति जनगणना का भी ये ही मंदिरवादी ताक़तें विरोध कर रही हैं।

मुंबई में सुबह-सुबह चाय पीते हुए मेरी नज़र मराठी के एक अख़बार की इस खबर पर अटक गई, जिसका शीर्षक था– “जातनिहाय जनगणनेला रा.स्व.संघाचा विरोध विदर्भ प्रांत सहसंघचालक श्रीधर गाडगे यांची भूमिका”। मराठी भाषी नहीं होने के बावजूद पूरी ख़बर पढ़कर समझ आया कि जातिवार जनगणना पर संघ का विरोध है। जातिगत जनगणना के ख़िलाफ़ संघ की भूमिका स्पष्ट करते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विदर्भ प्रांत संघचालक श्रीधर गाडगे ने संघ मुख्यालय नागपुर से यह बात कही। उस दिन कुछ ही घंटों में सभी भाषा के समाचार माध्यम जातिगत जनगणना पर आरएसएस के नजरिए के बारे में खबरों से भर गए और सोशल मीडिया पर लोगों ने जमकर इस बात को प्रचारित किया। श्रीधर गाडगे के वक्तव्य से एक प्रकार से संघ का अधिकृत पक्ष सामने आया कि संघ का जातिगत जनगणना पर ऑफ़िशियल स्टैंड क्या है।

हिंदी के प्रमुख अख़बारों में छपी ख़बर के मुताबिक़ आरएसएस के प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने एक बयान में कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी भी प्रकार के भेदभाव एवं विषमता से मुक्त समरसता एवं सामाजिक न्याय पर आधारित हिंदू समाज के लक्ष्य को लेकर सतत कार्यरत है। यह सत्य है कि विभिन्न ऐतिहासिक कारणों से समाज के अनेक घटक आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ गए। उनके विकास, उत्थान एवं सशक्तिकरण की दृष्टि से विभिन्न सरकारें समय-समय पर अनेक योजनाएं एवं प्रावधान करती हैं, जिनका संघ पूर्ण समर्थन करता है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ समय से जाति आधारित जनगणना की चर्चा पुनः प्रारंभ हुई है। हमारा यह मत है कि इसका उपयोग समाज के सर्वांगीण उत्थान के लिए हो और यह करते समय सभी पक्ष यह सुनिश्चित करें कि किसी भी कारण से सामाजिक समरसता एवं एकात्मकता खंडित ना हो।

वहीं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा कि महाराष्ट्र प्रगतिशील राज्य है और इसकी संस्कृति एवं परंपराएं अन्य राज्यों से अलग हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि यहां सभी समुदाय और जातियां एक साथ रहती हैं, एक साथ काम करते हैं एवं एक साथ जश्न मनाते हैं। इसलिए, समाज के सभी वर्गों की राय लेने के बाद लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए जातिगत जनगणना के संबंध में उचित निर्णय लिया जाएगा।

दरअसल, संघ पलटी मारने में माहिर है। उसके हज़ार मुंह हैं। हर मुंह अलग बोलता है। लेकिन इन सबको मतभिन्नता दर्शाने की ट्रेनिंग मिली हुई है। यह एक क़िस्म की निर्मित असहमति है, जिस पर सबकी सहमति है। इसके उद्देश्य राजनीतिक और सैद्धांतिक रूप से खुद को सही बनाए रखना और देश की बड़ी आबादी को असमंजस में डाले रखना है। संघ का जाति जनगणना का विरोध इस तर्क पर है कि इस तरह का डेटा बाहर आने के बाद जातिप्रथा मज़बूत होगी और लोग जातिगत भेदभाव से मुक्त नहीं हो पाएंगे, जबकि संघ तो जाति को मिटाना चाहता है और एक समग्र वृहतर हिंदू समाज की रचना करना चाहता है। भला किसी को इस बात से क्या विरोध हो सकता है कि जाति प्रथा और उससे जनित समस्याएं मिटे। अगर संघ यह चाहता है तो ठीक ही तो हैं न? पर क्या वाक़ई यह इतनी सरल बात है?

सवाल यह है कि संघ की मंशा सही है या संघ जाति मिटाने की आड़ में कुछ सक्षम जातियों को मिटा देने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है? सवाल इसलिए वाजिब है, क्योंकि जातिगत जनगणना से न केवल जातियों की संख्या का पता चलेगा, बल्कि यह भी पता चलेगा कि देश के संसाधनों पर किनका क़ब्ज़ा है और इसके बाद यह आवाज़ मुखर होगी कि जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। बस यही संघ और भाजपा के लोग नहीं चाहते हैं, इसलिए वे धार्मिक प्रतीकों की राजनीति करने लगते हैं और दलित, पिछड़े तबके उसकी तथाकथित सांस्कृतिक आध्यात्मिक राजनीति की भेंट चढ़ जाते हैं।

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