March 3, 2024

एस. चार्वाक

सरकार का यह दावा, कि यह सेंगोल गवर्नर जनरल माउंटबेटन द्वारा नेहरू को सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के तौर पर सौंपा गया था, बिल्कुल आधारहीन है। अगर ऐसा किया गया होता तो उसके लिए एक राजकीय समारोह आयोजित किया गया होता और उसके फोटो, वीडियो और खबरें पूरी दुनिया में प्रचारित और प्रसारित हुई होतीं और सरकारी गजट में उस आयोजन के दस्तावेज़ उपलब्ध होते।

सभी ऐतिहासिक दस्तावेज़ और लगभग सभी प्रतिष्ठित इतिहासकार यह साबित कर रहे हैं कि सेंगोल की सरकारी कहानी एक झूठ के पुलिन्दे से ज्यादा कुछ नहीं है। इसके लिए एक पटकथा लिख कर नेहरू और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के किरदारों को लेकर सत्ता हस्तांतरण के तरीक़ों पर विचार-विमर्श और ब्राह्मण पुजारियों द्वारा मंत्रोच्चार के साथ नेहरू को सेंगोल भेंट करने के दृश्यों का फिल्मांकन कराया गया।

फिल्म में जगह-जगह पर कुछ वास्तविक ऐतिहासिक फोटोग्राफ डाले गये, और इस फिल्म को स्वयं गृहमंत्री अमित शाह द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखाया गया, जबकि फिल्म में कहीं भी चेतावनी नहीं दिखायी गयी है कि यह कलाकारों द्वारा अभिनीत एक नाटक है। इस बात की पूरी आशंका है कि इस फिल्म को देखने वाले बहुत सारे लोग इसे नाटक के बजाय सच्ची ऐतिहासिक दस्तावेज़ी फिल्म मान लेंगे।

दिल्ली में डॉ बीआर आंबेडकर यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ कल्चर एंड क्रिएटिव एक्सप्रेशन में एंथ्रोपोलॉजी के एसोसिएट प्रोफ़ेसर राजन कुराई कृष्णन बीबीसी से बातचीत में कहते हैं कि, “लोकतंत्र की दो धाराएं होती हैं। एक है, लोगों द्वारा सेल्फ़ रूल, जिसे चुने हुए प्रतिनिधियों और उनके विपक्ष द्वारा चलाया जाता है। दूसरी है बाहरी ताक़तों के ख़िलाफ़ सामूहिक संप्रभुता। दूसरी धारा को चिह्न की ज़रूरत होती है। जैसे इंग्लैंड में किंग है या अमेरिका के व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति।

भारत की स्वतंत्रता के समय भी ऐसा ही कुछ हुआ था। संभवतया नेहरू की इसमें दिलचस्पी नहीं थी क्योंकि वो एक गंभीर लोकतंत्रवादी थे और इन परंपरागत चीज़ों के प्रति उत्सुक नहीं थे। इसीलिए उन्होंने सेंगोल को इलाहाबाद म्यूज़ियम में भेज दिया। हालांकि ये बहुत दिलचस्प है कि बीजेपी राजकीय सत्ता की विरासत में इच्छुक है। बीजेपी अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी की तरह केंद्रीकृत सत्ता की मांग करती है।”

सरकार अपनी दलील के पक्ष में मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया में प्रचारित लेखों, किताबों और बयानों तथा ब्लॉगों का उल्लेख कर रही है, न कि विश्वसनीय सरकारी दस्तावेज़ों का। ‘द हिंदू’ अखबार की रिपोर्टों में भी इस सेंगोल को तमिलनाडु के अधीनम मठ के पुजारियों द्वारा भेंट के रूप में ही नेहरू को देने का जिक़्र है। बल्कि इसमें 11 अगस्त 1947 को इस सेंगोल के साथ दिल्ली रवाना होने से पहले मद्रास के सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर खड़े एक प्रतिनिधि मंडल की तस्वीर छपी है, यानि यह प्रतिनिधिमंडल ट्रेन से दिल्ली आया था। इससे सरकारी कहानी का वह झूठ उजागर हो जाता है जिसके अनुसार इस सेंगोल को विशेष विमान से दिल्ली मंगवाया गया था। यों भी उस समय विमान सेवाएं अत्यंत कम थीं।

25 अगस्त 1945 के ‘टाइम’ मैगजीन में यह छपा था कि प्रधान पुजारी की यह राय थी कि “सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के तौर पर एक राजदंड दिया जाना चाहिए”, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि नेहरू भी इस विचार को मानते। लैरी कोलिंस और डोमिनिक लैपियर की पुस्तक ‘फ्रीडम ऐट मिडनाइट’, आंबेडकर की ‘थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्स’, यास्मीन खान की ‘ग्रेट पार्टिशन : द मेकिंग ऑफ इंडिया एंड पाकिस्तान’ और पैरी एंडरसन की पुस्तक ‘द इंडियन आइडियोलॉजी’ में भी इसी तरह के विचार रखे गये हैं।

इन सभी पुस्तकों में नेहरू द्वारा कुछ धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने की आलोचना की गयी है, लेकिन किसी में सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के तौर पर किसी सेंगोल के इस्तेमाल का जिक़्र नहीं है। तमिलनाडु के थंजावुर में स्थित तमिल यूनिवर्सिटी में आर्कियोलॉजी के प्रोफ़ेसर एस राजावेलु ने भी बीबीसी को बताया है कि “जब भारत आज़ाद हुआ तो प्रधानमंत्री बनने के बाद जवाहरलाल नेहरू को ये उपहार में दिया गया था।”

‘सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ जवाहरलाल नेहरू’ के संपादक प्रोफ़ेसर माधवन पलट ने बीबीसी से बातचीत में कहा है कि ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है कि ‘लॉर्ड माउंटबेटेन ने इसे प्रधानमंत्री नेहरू को दिया और नेहरू ने इसे स्वीकार किया। इसके दो कारण हैं, “अगर माउंटबेटेन ने नेहरू को सत्ता हस्तानांतरण के प्रतीक के तौर पर ये सौंपा होता, तो इसका पूरा प्रचार भी किया जाता। सत्ता हस्तानांतरण के बारे में सभी तस्वीरों में भी ये होता, क्योंकि इस तरह के प्रचार का अंग्रेज़ बहुत ख़्याल रखते थे।

सेंगोल ताजपोशी के दौरान क्वीन के राजदंड जैसा है और वे इसको प्रचारित करना पसंद करते। मुझे नहीं लगता कि माउंटबेटन ने इसे नेहरू को दिया था। दूसरी बात है कि नेहरू औपनिवेशिक देश की ओर से सत्ता के ऐसे किसी प्रतीक को कभी स्वीकार नहीं करते। ये प्रतीकवाद ग़लत है। उन्होंने सीधे केवल भारत की जनता, संविधान सभा, संविधान या इसके समकक्ष किसी संस्था से ही सत्ता को स्वीकार किया होगा। वे ऐसी चीज को कभी भी इजाजत नहीं दे सकते थे।”

अगर सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के तौर पर इस सेंगोल के इस्तेमाल का प्रामाणिक दस्तावेज़ कहीं भी मौजूद नहीं है, और सभी इतिहासकारों ने इस परिकल्पना के नेहरू के व्यक्तित्व से मेल न खाने की भी बात लिखी है, तो आखिर मोदी, उनकी भाजपा और उनके पीछे संघ की पूरी संरचना इसे लोकसभा में स्थापित करने के लिए इतनी उतावली क्यों है? इसके कई कारण हैं। एक तो इस बहाने भाजपा अभी तक अजेय बने हुए तमिल दुर्ग में प्रवेश के रास्ते खोलना चाहती है। वह पिछले लंबे अरसे से इसकी कोशिश कर रही है। अगले साल लोकसभा चुनावों के पहले इसी तरह की, सेंगोल के बहाने यह एक और कोशिश है। नवंबर 2022 में मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में एक महीने तक चला ‘काशी तमिल संगमम्’ भी ऐसी ही एक कोशिश थी।

इसी तरह से उनके गृहराज्य गुजरात से तमिलों का संबंध जोड़ने के लिए इसी अप्रैल 2023 में ‘सौराष्ट्र तमिल संगमम्’ का आयोजन किया गया था। इस आयोजन के लिए, सौराष्ट्र में रहने वाले तमिलनाडु के लगभग 3,000 लोगों को विशेष ट्रेनों में गुजरात ले जाया गया ताकि उन्हें अपने पूर्वजों की भूमि से जोड़ने में मदद मिल सके। आगंतुकों को, जिन्हें “तीर्थयात्री” कहा गया, 25,000 लोगों की सूची से चुना गया था, जिन्होंने इस कार्यक्रम के लिए पंजीकरण कराया था, और मुफ्त भोजन, बोर्डिंग और कुछ तय जगहों का पर्यटन कराया गया।

इन “तीर्थयात्रियों” को एक पुस्तिका दी गयी, जिसमें बताया गया है कि, “1024 और 1500 ई. के बीच आधुनिक पुरातात्विक खुदाई के दौरान पाए गए शिलालेखों पर यह उल्लेख किया गया है कि सोमनाथ मंदिर पर इस्लामी कट्टरपंथियों के आक्रमणों की एक शृंखला ने मेहनती, समृद्ध, कुशल और शांतिप्रिय समुदायों को विनाश और मृत्यु से बचने के लिए अपने घरों से भागने के लिए मजबूर किया।” पुस्तिका के इस दावे पर पुदुच्चुरी के फ्रेंच इंस्टीट्यूट में एपिग्राफिस्ट (पुरालेखवेत्ता) और इंडोलॉजी (भारत संबंधीज्ञान) के पूर्व प्रमुख वाई. सुब्बारायालु ने कहा है कि “पुस्तिका में वर्णित इन दावों को साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है।

सौराष्ट्र के लोग मदुरै और तमिलनाडु के अन्य हिस्सों में बसे हुए हैं। वे धीरे-धीरे प्रवासित हुए, ज्यादातर 15वीं और 16वीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य के शासनकाल के दौरान। यह साबित करने के लिए कोई अभिलेख नहीं है कि उनके प्रवास का संबंध सोमनाथ पर हुए हमलों से था।” इससे समझा जा सकता है कि किसी न किसी बहाने तमिलों में भी निराधार सांप्रदायिक मुद्दों और जहर का बीजारोपण किस ‘महान सांस्कृतिक मेलजोल’ के उद्देश्य से किया जा रहा है।

इसी कड़ी में ‘केदारनाथ तमिल संगमम्’ की भी योजना है। ये केंद्र की ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ पहल की शृंखला की कड़ियां हैं, जिनका उद्देश्य ऊपरी तौर पर तो विभिन्न राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के बीच ‘बातचीत व सांस्कृतिक आदान-प्रदान’ को बढ़ावा देना है। हालांकि जनता के खून-पसीने की कमाई से अर्जित राजस्व का इस्तेमाल किस तरह से लोगों के बीच नफरत को बढ़ावा देने के लिए, और इसी आधार पर अपने चुनाव जीतने के लिए किया जा रहा है, वह स्पष्ट दिख रहा है।

दूसरा कारण आरएसएस-जनसंघ-भाजपा का अतीत है। संघ राजे-रजवाड़ों द्वारा अपने राजनीतिक-आर्थिक हितों की रक्षा के लिए स्थापित किया गया था। इसके भीतर राजाओं, राजतंत्रों और राजशाही के प्रतीकों के प्रति हमेशा एक मोह बना रहता है। यहां तक कि जब पड़ोसी देश नेपाल में वहां की जनता अपनी राजशाही के खिलाफ लड़ रही थी, तब भी ये लोग राजशाही के पक्ष में खड़े थे और उसे बचाये रखना चाहते थे।

तीसरा कारण स्वयं मोदी के व्यक्तित्व में निहित है। वे जिस तरह के आत्ममोह और अहंकार से ग्रस्त दिखते हैं, उनके अंदर यह स्वाभाविक भूख हो सकती है कि वे खुद को पुराने साम्राज्यों, जैसे कि चोल साम्राज्य, के उत्तराधिकारी के तौर पर इस राजदंड या सिंगोल को सत्ता के प्रतीक के रूप में स्वीकार करें और लोकतंत्र की प्रतीक संसद के सीने में राजशाही के इस प्रतीक को भोंक दें। नेहरू तो सिर्फ बहाना हैं। वे इतने लोकतंत्रवादी तो थे ही, कि अपने आवास पर आये पुंजारियों की भावनाओं को न दुखाते हुए इसे भेंट के रूप में स्वीकार कर लेने के बावजूद इस प्रतीक को उसकी सही जगह, म्यूजियम, यानि इतिहास के कूड़ेदान में चुपचाप रखवा दिये।

यह उनके लिए किसी शान या गरिमा की चीज नहीं थी, बल्कि शर्म की चीज थी। लेकिन मोदी और उनकी पार्टी इतिहास की जिन प्रतिक्रियावादी परंपराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, वे इतिहास के उसी कूड़ेदान से खोद-खोद कर ऐसे सभी कलंक चिह्नों को अपने माथे पर तिलक की तरह चिपका कर शेखी बघारते हुए जुलूस निकाल कर घूमते फिर रहे हैं। यह उनका सौभाग्य है कि चीख-चीख कर सबको “राजा तो नंगा है” बताने वाले बच्चों की आवाजें अभी नक्कारखाने में तूती साबित हो रही हैं।

(एस. चार्वाक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं, लेख ‘द हिंदू’ और ‘बीबीसी’ की रिपोर्ट पर आधारित है)

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