March 3, 2024

मणिपुर में ताजा जातिगत संघर्ष दो मई 2023 से शुरू हुआ. उसके बाद से वहां से लूटपाट व आगजनी जैसी हिंसा की खबरें तो लगातार आ रही थीं पर व्यापक पैमाने पर क्रूर यौन हिंसा भी की जा रही है इसका सच 19 जुलाई को एक वीडियो वायरल होने के बाद ही उजागर हुआ. फिर जिस तरह से तीन महीने से मणिपुर पर खामौश प्रधानमंत्री को मजबूरन अपना मुंह खोलना पड़ा और मुख्यमंत्री को भी कहना पड़ा कि हम दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे. वह कुछ-कुछ वैसा ही था जैसे कि नोआखली की हिंसा को तत्कालीन बंगाल के प्रधानमंत्री हुसैन सुहरावर्दी ने तब माना जब खुद महात्मा गांधी वहां जाकर बैठ गए और सांप्रदायिक सद्भाव के लिए अपना मिशन शुरू किया.

नोआखली की हिंसा को भारत विभाजन पूर्व की क्रूरतम हिंसा माना जाता है. इसे वहां की अखिल भारतीय मुस्लिम लीग सरकार के इशारे पर नियोजित ढंग से बहुसंख्यक मुसलमानों द्वारा अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ करवाया गया था. पाकिस्तान की मांग को लेकर ‘सीधी कार्रवाई दिवस’ की मोहम्मद अली जिन्ना की घोषणा के साथ ही कलकत्ता (कोलकाता) में हिंदुओं के प्रति हिंसा, मारकाट, लूटपाट व हत्याओं का दौर कई दिन तक चलता रहा था.

क्योंकि यह हिंसा सरकारी संरक्षण में हो रही थी तो उनको बचाने वाला भी कोई नहीं था. कांग्रेस कार्यकर्ता भी खुद को असहाय महसूस कर रहा था. किसी भी तरफ से सहारा न मिलता देख हिंदुओं ने खुद ही अपने को समूहों में संगठित किया और मुसलमानों के खिलाफ हथियार उठाया. इसे लीग बर्दाश्त नहीं कर पाई. और बदला लेने के लिए नोआखली के दंगे नियोजित किए.

नोआखली चटगांव डिवीजन का मुस्लिम बहुसंख्यक जिला था. यहां हिंदू अल्पसंख्यक पर जमींदार था और उसके पास काफी जमीनें थीं. ये दंगे कई दिन तक चलते रहे. दिल्ली तक यह बात तो पहुंच रही थी कि वहां बहुत ज्यादा मारकाट व हिंसा हुई है पर यह कोई नहीं बता पा रहा था कि वास्तव में हुआ क्या है.

गांधी इस बात को लेकर बेहद परेशान थे. बंगाल की सरकार कह रही थी कि कुछ नहीं हुआ. सब ठीक है. कलकत्ता में बैठे कांग्रेस नेताओं को भी कुछ पता नहीं था. आखिर एक दिन बापू ने अपनी शाम की प्रार्थना सभा में कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष को वहां जाना चाहिए फिर चाहे वहां जाने के बाद उसे अपनी जान ही क्यों न दे देनी पड़े. और जेबी कृपलानी अगले ही दिन वहां के लिए रवाना हो गए. साथ में पत्नी सुचेता कृपलानी भी गईं.

कलकत्ता पहुंचने पर वहां के कांग्रेस अध्यक्ष ने हाथ खडे़ कर दिए कि नोआखली तक जाने का कोई रास्ता नहीं है. दंगाइयों ने सारे रास्ते काट दिए हैं. दहशत के मारे वे उनके साथ वहां नहीं गए. कृपलानी सुहरावर्दी से मिले तो उनका कहना वहीं था- वहां हालात ठीक हैं. वहां जाने की कोई जरूरत नहीं है. फिर भी जैसे-तैसे वे पति पत्नी वहां पहुंचे और तब पता चला कि कितनी बड़ी संख्या में वहां हिंदुओं का कत्लेआम हुआ है. लाशों से गांव के गांव, रास्ते के रास्ते अटे पड़े थे. हिंदुओं को उनके घरों से निकाल उन पर कब्जे कर लिए गए थे. सबको धर्म बदलने पर मजबूर किया गया था. लड़कियों का अपहरण, बलात्कार और यौन हिंसा के अलावा उनका धर्म बदलकर अपने परिवारों में शादियां करवा दी गईं थीं. मंदिरों को तोड़ दिया गया था. जमींदारों के हलों को आग लगा दी गई थी और बैलों को मारकर उनका मांस पकाकर खा लिया गया था.

अगर कहीं हिंदू अपने को बचा पाने में कामयाब हो भी गए तो वे इतना डरे हुए थे कि किसी एक ही कमरे में दो-तीन परिवार और उनके पशु भी साथ ही रह रहे थे. सभी भूखे प्यासे. कई दिन से. कोई बाहर नहीं निकलता था. एक भी पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी, कर्मचारी वहां नहीं. तीन दिन तक हालात का जायजा लेने के बाद जेबी कृपलानी तो दिल्ली लौट गए. पर सुचेता कृपलानी वहीं रह गई.

क्यों? इसलिए कि जब दोनों ने वापस जाना तय किया तो कुछ हिंदू जेबी के पास आए और बोले कि आप तो जाइए,पर इस मां को हमारे पास रहने दीजिए. उनके स्वर की कातरता को देखते हुए दोनों ही निशब्द हो गए और फिर सुचेता छह महीने वहां रहीं. सात नवंबर को गांधी वहां आए तो वे वहीं पर थीं.

धर्मांतरण को छोड़ दें, तो मणिपुर में कुकी समुदाय व महिलाओं के प्रति हिंसा की कहानी भी ऐसी ही है. दो मई को वहां जातीय हिंसा की शुरुआत हुई. उसी दिन से महिलाओं के प्रति यौन हिंसा भी शुरू हुई. पर मुख्यमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, वहां की राज्यपाल जो एक महिला ही है, शांति समिति, सेना के अधिकारी किसी ने गलती से भी मुंह से नहीं निकाला कि वहां महिलाओं के प्रति भी हिंसा हो रही है या फिर उसे रोकने का कोई प्रयास किया हो.

क्या माना जाए? सुहरावर्दी कहते रहे सब ठीक है. और यहां? जो हो रहा है होता रहने दो.

मई में एक के बाद एक महिलाओं के प्रति हिंसा की वारदातें हुईं. खासतौर से कुकी क्षेत्र चूड़ाचांदपुर में. बहुसंख्यक मेईतेई समुदाय के लोगों द्वारा लगातार उनके प्रति संगठित यौन हिंसा की गई. सामूहिक बलात्कार. भीड़ में. बलात्कार की शिकार कुकी महिलाओं की ओर से दिए गए बयानों को मानें, तो भीड़ में शामिल मेईतेई महिलाएं भी भीड़ को यौन हिंसा के लिए उकसा रही थीं.

वो इसलिए कि चार मई को झूठी खबर फैला दी गई कि चूड़ाचांदपुर में मेईतेई महिला के साथ कुकी आदमियों ने बलात्कार किया है. पांच मई को पुलिस महानिरीक्षक ने इसका खंडन किया. जिस लड़की का नाम लिया जा रहा थ उसके पिता ने भी खंडन कर दिया. पर तब तक तो भीड़ पागल हो चुकी थी. ऐसे में पुलिस व प्रशासन की जिम्मेदारी होती है कि वह लोगों को भरोसे मे लेकर शांत करे. पर ऐसा कुछ नहीं किया गया.

जिन दो महिलाओं का वीडियो वायरल हुआ है उनका कहना है कि खुद पुलिस उन्हें गांव से बाहर लाई और कुछ दूर जाकर भीड़ के हवाले कर दिया. इनमें से एक महिला के पति ने 18 मई को थाने में शिकायत लिखाई पर कुछ नहीं हुआ. 62 दिन बाद जब यह वीडियो वायरल हुआ तो पुलिस को (मजबूरन) उसमें दिखाई दे रहे युवकों को गिरफ्तार करना पड़ा. आगे बढ़ने से पहले यहां यह समझ लेना जरूरी है कि वहां मुख्य रूप से जिन दो समुदायों में अपने हितों के लिए संघर्ष चल रहा है, उनमें से एक कुकी-जोमी समुदाय है. यह आदिवासी है, ईसाई है और पहाड़ पर रहता है. मेईतेई हिंदू हैं, धनी हैं, सत्ता में बड़े भागीदार हैं और घाटी में रहते हैं. अब वह अपने को आदिवासी घोषित करने की मांग कर रहे हैं जिसका अर्थ होगा कि उसे भी आदिवासियों की जमीन खरीदने का अधिकार मिल जाएगा.

कुकी व अन्य आदिवासी समुदायों की यह एक बड़ी चिंता है. क्योंकि इससे वे और अधिक सबल हो जाएंगे. वैसे भी दोनों समुदायों के बीच हितों का संघर्ष बहुत पुराना है. यहां यह बताने की जरूरत नहीं कि वहां के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह भी मेईतेई ही हैं. वे चाहते तो कम से कम महिलाओं के संदर्भ में अपने समुदाय को शांत करने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर सकते थे पर मामला अगर हिंदू राष्ट्रवाद का हो तो फिर तो छूट ही देनी होगी और वह दी ही जा रही है. कमबख्त वीडियो न आया होता तो प्रधानमंत्री तो अब भी चुप्पी ही साधे हुए थे. इसीलिए अब जो बोले भी तो राजस्थान व छत्तीसगढ़ को साथ घसीट लिया.

कहा जा रहा है कि मणिपुर की हिंसा ने देश को शर्मसार कर दिया. गलत. शर्मसार तो हमारे प्रधानमंत्री ने हमें किया जिन्हें जातिगत दंगों के तहत सोच-समझकर की गई यौन हिंसा और रोजमर्रा होने वाले बलात्कार का अंतर तक मालूम नहीं है. बीरेन सिंह और उनके बयान किसी भी संवेदनशील नागरिक के खून को खौला देने वाले हैं.

प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक जब सब चुप थे और राज्यपाल का सूचनातंत्र भी सोशल मीडिया ही था तो राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष की क्या बिसात कि वह मणिपुर के पुलिस-प्रशासन से पूछताछ करें. उनके पास मणिपुर की दो महिलाओं और मणिपुर ट्राइबल एसोसिएशन, जिसका मुख्यालय विदेश में हैं, ने 12 जून को ही ऑनलाइन पत्र लिखकर इन सारी वारदातों की जानकारी दे दी थी. उन्हें लगता था कि आयोग तो महिलाओं के सम्मान, संवैधानिक व मानवीय अधिकरों का रक्षक है. इसलिए गुहार भी लगाई थी कि वह इन सब घटनाओं पर स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्रवाई करे और हो सके तो एक जांच समिति भी बिठाए. लेकिन उन्हें इस मेल की पावती तक आयोग से नहीं मिली.

पर वीडियो सामने आते ही आयोग की अध्यक्ष ट्वीट करने से नहीं चूकीं. होना तो यह चाहिए था कि मेल को देखने के बाद वे अपने प्रतिनिधियों को मौके पर भेजकर मामले की जांच करवातीं. ट्वीट से हिंसा रुक जानी होती तो केंद्र सरकार भारी संख्या में केंद्रीय बलों को वहां न भेजती. कहना होगा कि आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने वहां के लोगों का विश्वास जीतने और उन्हें शांत करने का एक अच्छा मौका खो दिया.

दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने वहां जाने की घोषणा की है पर सवाल है कि केंद्र व भाजपा के साथ उनकी सरकार के रिश्तों को देखते हुए मुख्यमंत्री और केंद्र की इच्छा के बिना क्या वे वहां काम कर पाएंगी?

अब जरा मीडिया पर आते हैं. मणिपुर के अधिकतर बड़े अखबार और टीवी चैनल मेईतेई समुदाय के हैं और वे कुकी हिंसा की खबरें ज्यादा नहीं दे रहे. संगाई एक्सप्रेस अखबार ने तो उन्हें ‘एलियन’ तक बता दिया. पर देशभर के मीडिया को भी वहां हो रही संगठित यौन हिंसा की जानकारी इस वीडियो से ही मिली. क्यों?

दिल्ली के टीवी चैनलों की बात यहां नहीं करते, उन्होंने तो पता लग जाने के बाद भी उस पर ज्यादा बात करना जरूरी नहीं समझा. ऐसा करके उन्होंने बता दिया है कि अराजकता उन्हें स्वीकार्य है. ऐसा न होता तो एकाध को छोड़ हर चैनल पर पाकिस्तान से आई सीमा का प्रेम प्रसंग न चल रहा होता. मगर अंग्रेजी के बड़े अखबार जिनका उत्तर-पूर्व में भी नेटवर्क है, इस हिंसा का पता क्यों नहीं लगा पाए?

यौन हिंसा पर पहली विस्तृत रिपोर्ट 12 जुलाई को दप्रिंट ने दी. इससे पहले न्यूजक्लिक एक जून को लिख चुका था. ऐसे में मीडिया को भी अपने अंदर झांककर देखना होगा.

अब एक बार फिर नोआखली पर आते हैं. अगर वास्तव में ही मणिपुर में शांति स्थापित करनी है तो वहां किसी महात्मा गांधी को जाना होगा. वे अपनी पूरी टीम के साथ वहां गए थे. तीन महीने वहां रहे और नंगे पांव चले. उनका कहना था कि यहां की सारी जमीन यहां के लोगों का शवदाहगृह बनी है. इस पर चप्पल पहनकर चलने से उनका अपमान होगा. मैं वह नहीं कर सकता. वे हमलावर मुसलमानों के घरों में रहे. उन्हें हिंदुओं के घरों को फिर से बसाने के लिए प्रेरित किया. दोनों कौमों के बीच फैले अविश्वास व घृणा को दूर कर उन्हें गले मिलाया. शांति समितियां व राहत समितियां कायम की. जब सब शांत हो गया उसके बाद ही वहां से आए.

भारत के इतिहास में नोआखली की हिंसा और गांधी द्वारा वहां रहकर शांति का कायम किया जाना दोनों ही उल्लेखनीय हैं. हमें अपने अतीत से शिक्षा लेनी ही चाहिए. मणिपुर का कुकी आज वैसा ही भयभीत है जैसा कि नोआखली का हिंदू था. पर क्या मोदी जी के पास कोई गांधी है?

और इससे भी बड़ा सवाल कि क्या वे केंद्र व राज्य सरकार के संरक्षण में वहां हो रही जातिगत हिंसा को वास्तव में रोकना चाहते हैं. यह इस बात से तय होगा कि बहुसंख्यक हिंसा का उनका लक्ष्य पूरा हो गया है या नहीं. हां सुप्रीम कोर्ट, जैसा कि मुख्य न्यायाधीश ने कहा है, बीच में आ जाए तो बात अलग है. या फिर राष्ट्रपति कुकी महिलाओं के कातर स्वर से पिघलकर कोई निर्देश जारी कर दें.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद की एडजंक्ट प्रोफेसर रह चुकी हैं.)

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