May 25, 2024

महेन्द्र पांडे

जनवरी 2024 में केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय ने देश की अर्थव्यवस्था का आकलन कर बताया था कि हमारी मौजूदा अर्थव्यवस्था 3.7 ख़रब डॉलर की है। हमारे प्रधानमंत्री जी विकसित भारत, सबका साथ सबका विकास, दुनिया में पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और 5 ख़रब डॉलर वाली अर्थव्यवस्था की खूब बात करते हैं, मेनस्ट्रीम मीडिया भी प्रधानमंत्री को देश की अर्थव्यवस्था का विधाता करार देता है – पर, तथ्य यह है कि इस 3.7 खरब डॉलर में से लगभग 1 खरब डॉलर की संपत्ति, यानि 27 प्रतिशत, देश के महज 200 लोगों के पास है। जाहिर है, मोदी राज में विकास केवल अरबपतियों और पूंजीपतियों का हो रहा है। यदि इतना सीधा सा गणित भी मेनस्ट्रीम मीडिया जनता को नहीं बता पा रही है, या फिर विपक्षी दल जनता को नहीं बता पा रहे हैं, तो फिर निश्चित तौर पर आने वाले चुनावों में देश के सत्ता में परिवर्तन के कोई आसार नहीं हैं। इलेक्टोरल बांड की लूट तो बड़ा मुद्दा बनाने से पहले ही जनता भूल चुकी है।

मोदी जी बार-बार वर्ष 2025 तक 5 खरब डॉलर के अर्थव्यवस्था की बात करते रहे हैं, पर यह सब महज आंकड़ों की बाजीगरी ही नजर आती है। सत्ता में बैठे तमाम मंत्री अपनी मर्जी से परिस्थितियों और श्रोताओं के अनुसार 5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था के वर्ष निर्धारित करते हैं। मेनस्ट्रीम मीडिया तो इन तथ्यों को भी उजागर नहीं कर पाता है। 9 जनवरी 2024 को वाइब्रेंट गुजरात आयोजन में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने बताया कि वर्ष 2027-2028 तक देश की अर्थव्यवस्था 5 खरब डॉलर की हो जायेगी। इसके 13 दिनों बाद ही, 22 जनवरी 2024 को पेट्रोलियम मंत्री, हरदीप पुरी ने किसी सम्मेलन में बताया कि कुछ लोग कह रहे हैं कि 5 खरब डॉलर तक पहुँचने में 2027-2028 तक का समय लग जाएगा, पर हकीकत यह है कि भगवान् राम के आशीर्वाद और मोदी जी के कुशल नेतृत्व के कारण देश यह कारनामा 2024-2025 में ही कर लेगा। जाहिर है, देश की अर्थव्यवस्था का ज्ञान वित्त मंत्री से अधिक पेट्रोलियम मंत्री और प्रधानमंत्री को है – यानि किसी को कुछ भी नहीं पता है। हकीकत यह है कि वर्ष 2022 में 3.4 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था थी, जो तथाकथित रिकॉर्ड जीडीपी में वृद्धि के बाद भी 2023 में 3.7 खरब डॉलर तक ही पहुँच सकी है।

फोर्ब्स द्वारा वर्ष 2024 के अरबपतियों की सूची में 200 नाम भारत से हैं, जबकि वर्ष 2023 के सूचि में महज 169 भारतीय ही थे। इन 200 अरबपतियों की सम्मिलित सम्पदा 954 अरब डॉलर, यानि लगभग 1 खरब डॉलर है। वर्ष 2023 की तुलना में अरबपतियों की सम्मिलित सम्पदा में 41 प्रतिशत का उछाल आया है, वर्ष 2023 में यह 675 अरब डॉलर थी। देश की 140 करोड़ से अधिक आबादी है और इसकी जीडीपी औसतन 7.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ती है – इस आबादी में से महज 200 लोगों के पास जीडीपी का 27 प्रतिशत है, और इस 27 प्रतिशत में 41 प्रतिशत का उछल हो रहा है – यानि देश के गरीबों की सम्पदा में वृद्धि तो निगेटिव में हो रही है। यही मोदी जी का तथाकथित विकास है, जिसपर बेरोजगार, भूखे, नंगे सभी तालियाँ बजा रहे हैं और मोदी-मोदी के नारे लगा रहे हैं।

देश के सबसे अमीर, मुकेश अंबानी, एशिया के भी सबसे अमीर हैं और एशिया के पहले अरबपति हैं जिनकी संपदा 100 अरब डॉलर से भी अधिक है। दुनिया में मुकेश अंबानी समेत महज 14 अरबपति ऐसे हैं जिनकी संपदा 100 अरब डॉलर से अधिक है। वर्ष 2023 में अंबानी 83 अरब डॉलर के मालिक थे और 2024 में 116 अरब डॉलर तक पहुँच गए। गौतम अडानी की संपत्ति में इस दौरान 36.8 अरब डॉलर की बृद्धि दर्ज के गयी। सबसे अमीर व्यक्तियों में वैश्विक स्तर पर मुकेश अम्बानी 9वें स्थान पर हैं और गौतम अडानी 17वें स्थान पर हैं। देश की सबसे अमीर महिला सावित्री जिंदल हैं, जो देश के अरबपतियों की सूचि में चौथे स्थान पर हैं।

देश के अरबपतियों में से दो-तिहाई से अधिक की संपत्ति में वर्ष 2023 से 2024 के बीच बृद्धि दर्ज की गयी है, इनमें से 12 अरबपतियों की संपत्ति में इस दौरान दुगुने से अधिक की बृद्धि दर्ज की गयी है। इस अवधि के दौरान केवल शीर्ष 10 में से केवल दो अरबपतियों – सायरस पूनावाला और लक्ष्मी मित्तल – की संपत्ति कम हुई है। वर्ष 2024 के अरबपतियों की सूचि में 25 नए नाम भी हैं, जिसमें सबसे प्रमुख मेदान्ता ग्रुप ऑफ़ हॉस्पिटल्स के मालिक डॉ नरेश त्रेहन का है।

फोर्ब्स द्वारा प्रकाशित 38वीं एनुअल वर्ल्डस बिलियोनायर्स लिस्ट: फैक्ट्स एंड फिगर्स, के अनुसार वर्ष 2024 में अरबपतियों की संख्या इतिहास के किसी भी मुकाम से अधिक है, और इनकी सम्मिलित संपत्ति भी सर्वाधिक है। इस समय दुनिया में 2781 अरबपति हैं, यह संख्या वर्ष 2023 की तुलना में 141 अधिक है और इससे पहले के रिकॉर्ड वर्ष 2021 की तुलना में 26 अधिक है। इन अरबपतियों की सम्मिलित संपत्ति की कीमत 14.2 खरब डॉलर तक पहुँच गयी है, जो वर्ष 2023 की तुलना में 2 खरब डॉलर अधिक है, और पिछले रिकॉर्ड वर्ष 2021 की तुलना में 1.1 खरब डॉलर अधिक है। इस सूचि से यह भी स्पष्ट होता है कि अरबपतियों के बीच भी आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है।

इन अरबपतियों की सम्मिलित संपत्ति का मूल्य अमेरिका और चीन को छोड़कर दुनिया के हरेक देश के सकल घरेलू आय के सम्मिलत योग से भी अधिक है। अरबपतियों की सम्मिलित संपत्ति में ही पिछले एक दशक के दौरान 120 प्रतिशत बृद्धि दर्ज की गयी है। दुनिया के 14 अरबपति ऐसे भी हैं, जिसमें भारत के मुकेश अम्बानी शामिल हैं, जिनकी संपत्ति 100 अरब डॉलर या इससे अधिक है। वर्ष 2020 में ऐसे अरबपतियों की संख्या महज 1 थी। इन 14 अरबपतियों की कुल संपत्ति का मूल्य 2 खरब डॉलर से भी अधिक है, यानि कुल 2781 अरबपतियों में से शीर्ष 0.5 प्रतिशत के पास अरबपतियों की कुल सम्पदा में से 14 प्रतिशत संपत्ति है। अरबपतियों के बीच यह आर्थिक असमानता भी पहले कभी नहीं रही है। वर्ष 2024 की सूचि में 265 ऐसे अरबपति हैं, जिनका नाम पहली बार इस सूचि में शामिल किया गया है, जबकि वर्ष 2023 की सूचि में शामिल नामों में से 189 का नाम अब इस सूचि में नहीं है।

सबसे अधिक, 813 अरबपति अमेरिका में हैं, इनकी सम्मिलित संपत्ति 5.7 खरब डॉलर की है। वर्ष 2023 में अमेरिका के 735 अरबपतियों की कुल संपत्ति 4.5 ख़रब डॉलर थी। दूसरे स्थान पर 473 अरबपतियों के साथ चीन है, जिनकी सम्मिलित संपत्ति 1.7 खरब डॉलर है। तीसरे स्थान पर 200 अरबपतियों के साथ भारत है, जिनकी कुल संपत्ति 954 अरब डॉलर है। चौथे स्थान पर 132 अरबपतियों के साथ जर्मनी है।

मानवाधिकार संस्था, ग्लोबल जस्टिस नाउ, की डेज़ी पेअरसन के अनुसार अरबपतियों की बढ़ती संख्या के साथ ही पूरी दुनिया में बढ़ती गरीबी से यह स्पष्ट है कि यह असमानता अमीरों द्वारा गरीबों के शोषण और संपत्ति और सम्पदा पर अमीरों के एकाधिकार से ही बढ़ रही है। मानवाधिकार से जुडी दूसरी संस्था, हाई पे सेंटर, के अध्यक्ष ल्युक हिल्द्यार्ड के अनुसार फोर्ब्स की सूचि केवल यह नहीं बताती है कि दुनिया में कितने अरबपति हैं और उनकी संपत्ति कितनी है, बल्कि यह भी बताती है कि पूरी दुनिया में किस कदर आबादी को लूटा जा रहा है और संसाधनों पर कब्जा किया जा रहा है।

एक ऐसे देश में – जहां 81 करोड़ आबादी सरकार के मुफ्त राशन पर जिंदा हो, 55 करोड़ आबादी सरकारी इलाज के हवाले हो और 18 करोड़ किसानों को सरकार 500 रुपये महीने से खेती करा रही हो – अरबपतियों की संख्या साल-दर-साल बढ़ते जाना सामाजिक और आर्थिक असमानता का स्पष्ट प्रमाण है। पर, दुर्भाग्य यह है कि अफीम के नशे में डूबी बेरोजगार और भूखी जनता को कुछ भी नजर नहीं आ रहा है। मोदी जी ने हाल में ही एक चुनावी सभा में कहा था, “मैं मौज करने के लिए नहीं बल्कि काम करने आया हूँ” – यह कथन बिलकुल सही है, मोदी जी के काम का नतीजा पूंजीपतियों की मौज ही तो है।

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