March 3, 2024

फ्रांसीसी वेबसाइट मेदियापार की रिपोर्ट में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2015 की पेरिस यात्रा के बाद कारोबारी अनिल अंबानी द्वारा फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉ और वित्त मंत्री को भेजे गए पत्र का भी ख़ुलासा किया गया है, जिसमें उन्होंने 151 मिलियन यूरो के टैक्स बिल को कम करने की मांग की थी.

By The Wire

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फ्रांस दौरे से कुछ दिन पहले फ्रांसीसी इनवेस्टिगेटिव वेबसाइट मेदियापार ने खुलासा किया है कि पेरिस मजिस्ट्रेट ने भारत सरकार को एक आधिकारिक अनुरोध भेजा है, जिसमें दासो एविएशन द्वारा कथित तौर पर भारत में 36 रफाल लड़ाकू विमानों की बिक्री के लिए 2015-16 में हुए सौदे के हिस्से के तौर पर किए गए भुगतान को लेकर चल रही जांच में सहयोग मांगा है.

यान फिलिपिन की रिपोर्ट कहती है, ‘मजिस्ट्रेट दो भारतीय जांचों की केस फाइलों का अध्ययन करने में विशेष रुचि रखते हैं, जिसमें- जैसा कि  मेदियापार ने पहले बताया था– इस बात के विस्तृत सबूत हैं कि दासो ने 2016 में हुए इस सौदे को पाने के लिए गुप्त रूप से भारत के एक बिचौलिये सुषेन गुप्ता को कई मिलियन यूरो का भुगतान किया था.’

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फ्रांस दौरे से कुछ दिन पहले फ्रांसीसी इनवेस्टिगेटिव वेबसाइट मेदियापार ने खुलासा किया है कि पेरिस मजिस्ट्रेट ने भारत सरकार को एक आधिकारिक अनुरोध भेजा है, जिसमें दासो एविएशन द्वारा कथित तौर पर भारत में 36 रफाल लड़ाकू विमानों की बिक्री के लिए 2015-16 में हुए सौदे के हिस्से के तौर पर किए गए भुगतान को लेकर चल रही जांच में सहयोग मांगा है.

यान फिलिपिन की रिपोर्ट कहती है, ‘मजिस्ट्रेट दो भारतीय जांचों की केस फाइलों का अध्ययन करने में विशेष रुचि रखते हैं, जिसमें- जैसा कि  मेदियापार ने पहले बताया था– इस बात के विस्तृत सबूत हैं कि दासो ने 2016 में हुए इस सौदे को पाने के लिए गुप्त रूप से भारत के एक बिचौलिये सुषेन गुप्ता को कई मिलियन यूरो का भुगतान किया था.’

रिपोर्ट के अनुसार, इस बात की जानकारी नहीं है कि इस बारे में भारतीय प्रतिक्रिया क्या होगी. इस प्रकार के अनुरोध आमतौर पर विदेश मंत्रालय के माध्यम से भेजे जाते हैं और भारत में संबंधित विभाग द्वारा देखे जाते हैं- इस मामले में सबसे अधिक संभावना कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) और वित्त मंत्रालय, जो केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को संभालते हैं, द्वारा इस मामले को देखने की है.

द वायर  ने पेरिस में भारतीय दूतावास को पत्र लिखकर इस अनुरोध की स्थिति के बारे में जानकारी मांगी है. उनका जवाब मिलने पर यह खबर अपडेट की जाएगी.

बता दें कि सुषेन गुप्ता वर्तमान में वीवीआईपी हेलिकॉप्टर घोटाले में ईडी द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग जांच के घेरे में हैं. 2021 में मेदियापार द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट्स ने 15 साल की अवधि में दासो और थेल्स के साथ गुप्ता के गहरे कारोबारी संबंधों को उजागर किया, जिसमें कथित तौर पर सॉफ्टवेयर कंसल्टिंग के लिए बढ़े हुए चालान का इस्तेमाल करके ‘ऑफशोर खातों और शेल कंपनियों को गुप्त कमीशन में कई मिलियन यूरो’ का भुगतान करना शामिल था.

मेदियापार की यह हालिया रिपोर्ट रफाल से जुड़े रहस्य के दूसरे भाग पर भी नज़र डालती है- रिलायंस समूह के अरबपति अनिल अंबानी को 2015 में फ्रांस से मिली टैक्स कटौती.

मेदियापार ने खुलासा किया कि कैसे अंबानी ने फ्रांस के इकोनॉमी मंत्री (और अब राष्ट्रपति) इमैनुएल मैक्रॉ और वित्त मंत्री मिशेल सैपिन को पत्र लिखकर 151 मिलियन यूरो के टैक्स बिल को कम करने के लिए उनके व्यक्तिगत हस्तक्षेप का अनुरोध किया था.

रिपोर्ट में कहा गया है कि अंततः अनिल अंबानी को बहुत कम राशि- 6.6 मिलियन यूरो का भुगतान करने के लिए कहा गया था- यह राशि उस राशि जितनी ही थी, जिसका प्रस्ताव भारतीय व्यवसायी ने टैक्स अधिकारियों के साथ समझौते के रूप में रखा था.

अंबानी साल 2015 में फ्रांस में मोदी के साथ उस यात्रा के दौरान भी थे, जहां प्रधानमंत्री ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ 126 रफाल के सह-उत्पादन (को-प्रोडक्शन) के लिए किए गए पहले के सौदे को रद्द कर फ्रांसीसी निर्माता दासो से 36 विमानों की एकमुश्त खरीद का सौदा किया था.

मेदियापार को फ्रांस के टैक्स प्रशासन द्वारा एकत्र किए गए गोपनीय दस्तावेजों में अंबानी के पत्र के सबूत मिले. इसके सूत्रों ने कहा है कि इनमें से कुछ को 2016 में भारत को 36 रफाल लड़ाकू विमानों की बिक्री को लेकर भ्रष्टाचार के आरोपों की फ्रांसीसी न्यायिक जांच में एकत्र किए गए सबूतों में जोड़ा गया है.

उल्लेखनीय है कि पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने 2018 के एक साक्षात्कार में खुलासा किया था कि मोदी सरकार के जोर देने के बाद अंबानी को रफाल के साझेदार के रूप में सौदे में शामिल किया गया था. दासो एविएशन और रिलायंस ने इससे इनकार किया था और भारत सरकार ने उस समय कहा था कि फ्रांसीसी कंपनी द्वारा लिए गए ‘कारोबारी निर्णय’ में उसकी कोई भूमिका नहीं है.

भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने इसकी जांच का आदेश देने से इनकार कर दिया था, लेकिन यह सौदा फ्रांस में वर्तमान आपराधिक जांच का विषय है.

बता दें कि सुषेन गुप्ता वर्तमान में वीवीआईपी हेलिकॉप्टर घोटाले में ईडी द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग जांच के घेरे में हैं. 2021 में मेदियापार द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट्स ने 15 साल की अवधि में दासो और थेल्स के साथ गुप्ता के गहरे कारोबारी संबंधों को उजागर किया, जिसमें कथित तौर पर सॉफ्टवेयर कंसल्टिंग के लिए बढ़े हुए चालान का इस्तेमाल करके ‘ऑफशोर खातों और शेल कंपनियों को गुप्त कमीशन में कई मिलियन यूरो’ का भुगतान करना शामिल था.

मेदियापार की यह हालिया रिपोर्ट रफाल से जुड़े रहस्य के दूसरे भाग पर भी नज़र डालती है- रिलायंस समूह के अरबपति अनिल अंबानी को 2015 में फ्रांस से मिली टैक्स कटौती.

मेदियापार ने खुलासा किया कि कैसे अंबानी ने फ्रांस के इकोनॉमी मंत्री (और अब राष्ट्रपति) इमैनुएल मैक्रॉ और वित्त मंत्री मिशेल सैपिन को पत्र लिखकर 151 मिलियन यूरो के टैक्स बिल को कम करने के लिए उनके व्यक्तिगत हस्तक्षेप का अनुरोध किया था.

रिपोर्ट में कहा गया है कि अंततः अनिल अंबानी को बहुत कम राशि- 6.6 मिलियन यूरो का भुगतान करने के लिए कहा गया था- यह राशि उस राशि जितनी ही थी, जिसका प्रस्ताव भारतीय व्यवसायी ने टैक्स अधिकारियों के साथ समझौते के रूप में रखा था.

अंबानी साल 2015 में फ्रांस में मोदी के साथ उस यात्रा के दौरान भी थे, जहां प्रधानमंत्री ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ 126 रफाल के सह-उत्पादन (को-प्रोडक्शन) के लिए किए गए पहले के सौदे को रद्द कर फ्रांसीसी निर्माता दासो से 36 विमानों की एकमुश्त खरीद का सौदा किया था.

मेदियापार को फ्रांस के टैक्स प्रशासन द्वारा एकत्र किए गए गोपनीय दस्तावेजों में अंबानी के पत्र के सबूत मिले. इसके सूत्रों ने कहा है कि इनमें से कुछ को 2016 में भारत को 36 रफाल लड़ाकू विमानों की बिक्री को लेकर भ्रष्टाचार के आरोपों की फ्रांसीसी न्यायिक जांच में एकत्र किए गए सबूतों में जोड़ा गया है.

उल्लेखनीय है कि पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने 2018 के एक साक्षात्कार में खुलासा किया था कि मोदी सरकार के जोर देने के बाद अंबानी को रफाल के साझेदार के रूप में सौदे में शामिल किया गया था. दासो एविएशन और रिलायंस ने इससे इनकार किया था और भारत सरकार ने उस समय कहा था कि फ्रांसीसी कंपनी द्वारा लिए गए ‘कारोबारी निर्णय’ में उसकी कोई भूमिका नहीं है.

भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने इसकी जांच का आदेश देने से इनकार कर दिया था, लेकिन यह सौदा फ्रांस में वर्तमान आपराधिक जांच का विषय है.

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